अभिव्यक्ति स्वतंत्रता के मुख पर जाभी

मूलभूत अधिकारों के केंद्र में स्वयं को व्यक्त करने का अधिकार है, जिसका अर्थ है उन्मुक्त अभिव्यक्ति, परन्तु मानव के मुक्त अभिव्यक्ति का अधिकार केवल बोलने का अधिकार नहीं है| हम सभी स्वयं को विभिन्न तरीके से व्यक्त करते हैं| एक बच्चा जब तक बोलना नहीं सीखता तब तक अपनी भूख और अन्य आवश्यकताओं को रोकर व्यक्त करता है| आपके वस्त्र भी आपके व्यक्तित्व को व्यक्त करतें हैं| व्यक्ति के व्यक्तित्व के अपने गुण-धर्म होते हैं जो उसे व्यक्त करतें हैं| विरोध का प्रत्येक स्वर अभिव्यक्ति को जाहिर करता है | अभिव्यक्ति की संस्कृति में व्यक्तिगत लक्षण, सामुदायिक पहचान और शायद राष्ट्रवादियों की प्रथा एवं हम क्या खाते हैं सब समाहित है| बोलकर हम केवल अपने भावों का और विचारों का संवाद करते हैं, उस समय की इक्षा के गुण- धर्म को व्यक्त करते हैं| ऐसी अभिव्यक्ति संक्रमणकाल की अभिव्यक्ति होती है, जो आंशिक अभिव्यक्ति है स्वयं को उन्मुक्त होकर व्यक्त करना हीं मूलभूत और आवश्यक व्यक्तिगत अधिकार है| यह निश्चित तौर पर सचेत होकर विचार करने का विषय है कि अभिव्यक्ति किसी के लिए हानिकारक या किसी की अवमानना के लिए न हो और न ही किसी संवैधानिक नियम का उल्लंघन करें | चिंता का विषय चिंता करने का पहला विषय है ऐसी स्थापनाएं जो विवाद को जन्म देतीं हैं और वास्विक राष्ट्रीय मुद्दों से ध्यान भटकाती हैं, जैसे गौरक्षा के लिए किसी को मारना, एंटी रोमियो दल जो लड़कियों को छेड़खानी से बचाने की लिए हुआ पर उसका असर हम सब जानते हैं, लव- जिहाद , एक पशु के लिए मानव को मारना, स्वनियोजित राष्ट्रवादियों का इन सब मुद्दों पर मतभेद रखने वालों को, कश्मीर पर सरकार की आलोचना करने वालों को राष्ट्र विरोधी या पाकिस्तान जाने के लिए कहना सब केवल मुद्दे उछालना है ताकि वास्तविक समस्या छुपी रहे| मै क्या खाता हूँ यह मेरी अभिव्यक्ति की आज़ादी का हिस्सा है| यह मेरी पहचान का हिस्सा है| साथ में यह मेरी इक्षा है कि मै क्या खाऊं? और इस पर यदि कोई नियम का उल्लंघन नहीं हो रहा है, तो यह बिलकुल उचित है| अपने इक्षा की पूर्ती करना व्यक्तिगत अधिकार है| और इक्षा की पूर्ती के अधिकार को कोई भी पूर्व निर्धारित ढंग से नहीं रोक सकता| अभी हाल ही में पर्यावरण मंत्रालय ने जो पशुवध- विक्रय निषेध क़ानून पेश किया है वह विस्मय में डालता है| इस नियम को पशु पर क्रूरता निषेध (पशुधन बाजार नियमन अधिनियम २०१७) के अंतर्गत एक अधिसूचना जारी कर आना चाहिए था| नए नियम के अंतर्गत चुस्त बैल, बैल, भैंस, गाय, बछिया, बधिया बैल, बछड़ों, और ऊंट को बिना लिखित सूचना के नहीं बेचा जा सकता और लिखित में प्रत्येक बाजार समिति को यह देना है कि इसका विक्रय कृषि सम्बन्धी कार्य के लिए हो रहा है न कि कसाईघर के लिए| इस नियम के अनुसार यह सूचना छ; महीने तक संग्रहित करना अनिवार्य है| इस कारण केंद्र सरकार राज्य सरकार के अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप तो करेगी ही अपितु इसे नियम के अनुसार उचित भी करार देगी| ऐसे नियम सबसे पहले तो पशु क्रूरता निषेध अधिनियम १९६० के दायरे से बहुत दूर है| क्योंकि यह नियम पशुवध पर रोक नहीं लगाता और इस नियम के के अंतर्गत ऐसा कोई नियम थोपा भी नहीं जा सकता| दूसरी बात यह कि अनुच्छेद 19(छ)g किसी को भी कोई भी पेशा अपनाने की आजादी देता है | यह उनका मूलभूत अधिकार है| और यह अधिकार तब तक है जब तक यह किसी नियम को तोड़ता न हो या राज्य उस कार्य को अपने अधिकार क्षेत्र में न ले| इस नियम के आने के बाद पशुधन विक्रय सवैंधानिक दृष्टि में संदिग्ध हो जायेगा| अंतिम बात एक पशु की दैवीय विधान में दी जाने वाली बलि धार्मिक विधान में कुर्बानी क्या मूलभूत अधिकार के अंतर्गत नहीं आते बिलकुल आते हैं और यह सब अभिवयक्ति के अधिकार का हिस्सा है| यह निर्णय एक मनमान और अतार्किक निर्णय है कि गैरदुधारू पशुओं का वध नहीं किया जा सकता क्योंकि इसका असर अनेक किसान के जीविकोपार्जन पर पड़ेगा| प्रतिकूल प्रभाव सरकार को मांस व्यापार में लगे 22 लाख लोगों के रोजगार की कोई चिंता नहीं है| साथ ही किसान का कष्ट जो बढेगा सो अलग क्योंकि एक गैरआर्थिक पशु के रखरखाव में सालाना औसत ४०,०००रु लगते हैं जो एक छोटे और मझौले किसान के लिए बहुत बड़ी राशि है| कुल मांस उत्पादन में अभी पशुधन का ५% भैंस का २३% तथा ४६% मुर्ग्गी से आता है| इस नियम की परिभाषा के अनुसार २८% उत्पादन स्रोत पर इसका असर पड़ेगा| वर्ष २०१४ में भारत ने ब्राजील को पीछे छोड़ते हुए विश्व में पशुमांस निर्यात में शीर्षस्थान प्राप्त किया और कुल ४ अरब डॉलर की मात्रा का निर्यात किया| इस नियम से चमड़ा उद्योग पर भी असर पड़ेगा| अप्रैल – दिसंबर २०१६ में मांस निर्यात १३% कम हो चुका है| जो अभी और कम होगा| पशुचर्म और हड्डी का प्रयोग केवल चमड़ेउद्योग में ही नहीं होता अपितु साबुन निर्माण, दन्तपेस्ट, बटन, पेंटब्रश, शल्यचिकित्सा में टाँके, औषधि, वाध्य-यंत्र, आदि उद्योग में भी होता है| भारत का चमड़ा उद्योग विश्व के चमड़ेउद्योग का १२% है| भारत विश्व में पदत्राण उद्योग (फुट वियर) का ९% उत्पादन करता है| अब यदि पशु वध नहीं किया जाना है तो उनकी देखभाल की आवश्यकता है| और इससे पशु मालिकों पर ३०००रु का अतिरिक्त मासिक भार पड़ेगा| इससे भी अधिक और भयावह स्थिति पशुधन और कृषि के मिश्रित व्यवस्था वाली कृषि की होगी| आर्थिक सर्वेक्षण २०१५-१६ के अनुसार पशुधन किसानों को सूखे एवं बेरोजगारी के दिनों में धन उपलब्ध कराता है| राज्य भी उनसे पशुवध के लिए पशु खरीदते हैं| जिसमें भैंसों की संख्या 6.2 करोड़ थी| नए नियम के अनुसार अब दोनों ही बाजार से कोई ऐसा क्रय विक्रय नहीं कर सकते है| चुनावी कारण सरकार का इसमें कोई निर्णय तर्क पर आधारित नहीं है| उनका उद्द्शेय केवल धार्मिक चिमनी को जलाए रखना है ताकि गाय का मसला चलता रहे| जनता के बीच चर्चा के लिए अन्य मुद्दे न आयें| जनता का भावुक शोषण हो और बहुमत को उत्तेजित कर वोट लिया जा सके| व्यापार, उपभोग, रोजगार, यह सब प्रतिकूल अवस्था में ही रहें और असली मुद्दे जनता की भावना पर हलके पड़ते रहें| इलेक्ट्रोनिक मीडिया भी इसी मुद्दे पर चिल्ला रहा है और इसे तवज्जो दे रहा है| चारों ओर अशांति है, स्वघोषित पहरेदार यह सब स्थिरभाव से देख रहा है| इन मुद्दों पर स्पष्ट स्थिति देने में उसकी सरकार का गला बैठ गया है इसीलिए| ये सरकार दूसरों के अभिव्यक्ति के अधिकार के मुख पर भी जाभी लगा रही है| 19 जून 2017 सोमवार द हिन्दू , कपिल सिब्बल(कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्र मंत्री एवं जाने मान अधिवक्ता ) के लेख का अनुवाद

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अभिव्यक्ति स्वतंत्रता के मुख पर जाभी मूलभूत अधिकारों के केंद्र में स्वयं को व्यक्त करने का अधिकार है, जिसका अर्थ है उन्मुक्त अभिव्यक्ति, परन्तु मानव के मुक्त अभिव्यक्ति का अधिकार केवल बोलने का अधिकार नहीं है| हम सभी स्वयं को विभिन्न तरीके से व्यक्त करते हैं| एक बच्चा जब तक बोलना नहीं सीखता तब तक अपनी भूख और अन्य आवश्यकताओं को रोकर व्यक्त करता है| आपके वस्त्र भी आपके व्यक्तित्व को व्यक्त करतें हैं| व्यक्ति के व्यक्तित्व के अपने गुण-धर्म होते हैं जो उसे व्यक्त करतें हैं| विरोध का प्रत्येक स्वर अभिव्यक्ति को जाहिर करता है | अभिव्यक्ति की संस्कृति में व्यक्तिगत लक्षण, सामुदायिक पहचान और शायद राष्ट्रवादियों की प्रथा एवं हम क्या खाते हैं सब समाहित है| बोलकर हम केवल अपने भावों का और विचारों का संवाद करते हैं, उस समय की इक्षा के गुण- धर्म को व्यक्त करते हैं| ऐसी अभिव्यक्ति संकर्मणकाल की अभिव्यक्ति होती है, जो आंशिक अभिव्यक्ति है स्वयं को उन्मुक्त होकर व्यक्त करना हीं मूलभूत और आवश्यक व्यक्तिगत अधिकार है| यह निश्चित तौर पर सचेत होकर विचार करने का विषय है कि अभिव्यक्ति किसी के लिए हानिकारक या किसी की अवमानना के लिए न हो और न ही किसी संवैधानिक नियम का उल्लंघन करें | चिंता का विषय चिंता करने का पहला विषय है ऐसी स्थापनाएं जो विवाद को जन्म देतीं हैं और वास्विक राष्ट्रीय मुद्दों से ध्यान भटकाती हैं, जैसे गौरक्षा के लिए किसी को मारना, एंटी रोमियो दल जो लड़कियों को छेड़खानी से बचाने की लिए हुआ पर उसका असर हम सब जानते हैं, लव- जिहाद , एक पशु के लिए मानव को मारना, स्वनियोजित राष्ट्रवादियों का इन सब मुद्दों पर मतभेद रखने वालों को, कश्मीर पर सरकार की आलोचना करने वालों को राष्ट्र विरोधी या पाकिस्तान जाने के लिए कहना सब केवल मुद्दे उछालना है ताकि वास्तविक समस्या छुपी रहे| मै क्या खाता हूँ यह मेरी अभिव्यक्ति की आज़ादी का हिस्सा है| यह मेरी पहचान का हिस्सा है| साथ में यह मेरी इक्षा है कि मै क्या खाऊं? और इस पर यदि कोई नियम का उल्लंघन नहीं हो रहा है, तो यह बिलकुल उचित है| अपने इक्षा की पूर्ती करना व्यक्तिगत अधिकार है| और इक्षा की पूर्ती के अधिकार को कोई भी पूर्व निर्धारित ढंग से नहीं रोक सकता| अभी हाल ही में पर्यावरण मंत्रालय ने जो पशुवध- विक्रय निषेध क़ानून पेश किया है वह विस्मय में डालता है| इस नियम को पशु पर क्रूरता निषेध (पशुधन बाजार नियमन अधिनियम २०१७) के अंतर्गत एक अधिसूचना जारी कर आना चाहिए था| नए नियम के अंतर्गत चुस्त बैल, बैल, भैंस, गाय, बछिया, बधिया बैल, बछड़ों, और ऊंट को बिना लिखित सूचना के नहीं बेचा जा सकता और लिखित में प्रत्येक बाजार समिति को यह देना है कि इसका विक्रय कृषि सम्बन्धी कार्य के लिए हो रहा है न कि कसाईघर के लिए| इस नियम के अनुसार यह सूचना छ; महीने तक संग्रहित करना अनिवार्य है| इस कारण केंद्र सरकार राज्य सरकार के अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप तो करेगी ही अपितु इसे नियम के अनुसार उचित भी करार देगी| ऐसे नियम सबसे पहले तो पशु क्रूरता निषेध अधिनियम १९६० के दायरे से बहुत दूर है| क्योंकि यह नियम पशुवध पर रोक नहीं लगाता और इस नियम के के अंतर्गत ऐसा कोई नियम थोपा भी नहीं जा सकता| दूसरी बात यह कि अनुच्छेद 19(छ)g किसी को भी कोई भी पेशा अपनाने की आजादी देता है | यह उनका मूलभूत अधिकार है| और यह अधिकार तब तक है जब तक यह किसी नियम को तोड़ता न हो या राज्य उस कार्य को अपने अधिकार क्षेत्र में न ले| इस नियम के आने के बाद पशुधन विक्रय सवैंधानिक दृष्टि में संदिग्ध हो जायेगा| अंतिम बात एक पशु की दैवीय विधान में दी जाने वाली बलि धार्मिक विधान में कुर्बानी क्या मूलभूत अधिकार के अंतर्गत नहीं आते बिलकुल आते हैं और यह सब अभिवयक्ति के अधिकार का हिस्सा है| यह निर्णय एक मनमान और अतार्किक निर्णय है कि गैरदुधारू पशुओं का वध नहीं किया जा सकता क्योंकि इसका असर अनेक किसान के जीविकोपार्जन पर पड़ेगा| प्रतिकूल प्रभाव सरकार को मांस व्यापार में लगे 22 लाख लोगों के रोजगार की कोई चिंता नहीं है| साथ ही किसान का कष्ट जो बढेगा सो अलग क्योंकि एक गैरआर्थिक पशु के रखरखाव में सालाना औसत ४०,०००रु लगते हैं जो एक छोटे और मझौले किसान के लिए बहुत बड़ी राशि है| कुल मांस उत्पादन में अभी पशुधन का ५% भैंस का २३% तथा ४६% मुर्ग्गी से आता है| इस नियम की परिभाषा के अनुसार २८% उत्पादन स्रोत पर इसका असर पड़ेगा| वर्ष २०१४ में भारत ने ब्राजील को पीछे छोड़ते हुए विश्व में पशुमांस निर्यात में शीर्षस्थान प्राप्त किया और कुल ४ अरब डॉलर की मात्रा का निर्यात किया| इस नियम से चमड़ा उद्योग पर भी असर पड़ेगा| अप्रैल – दिसंबर २०१६ में मांस निर्यात १३% कम हो चुका है| जो अभी और कम होगा| पशुचर्म और हड्डी का प्रयोग केवल चमड़ेउद्योग में ही नहीं होता अपितु साबुन निर्माण, दन्तपेस्ट, बटन, पेंटब्रश, शल्यचिकित्सा में टाँके, औषधि, वाध्य-यंत्र, आदि उद्योग में भी होता है| भारत का चमड़ा उद्योग विश्व के चमड़ेउद्योग का १२% है| भारत विश्व में पदत्राण उद्योग (फुट वियर) का ९% उत्पादन करता है| अब यदि पशु वध नहीं किया जाना है तो उनकी देखभाल की आवश्यकता है| और इससे पशु मालिकों पर ३०००रु का अतिरिक्त मासिक भार पड़ेगा| इससे भी अधिक और भयावह स्थिति पशुधन और कृषि के मिश्रित व्यवस्था वाली कृषि की होगी| आर्थिक सर्वेक्षण २०१५-१६ के अनुसार पशुधन किसानों को सूखे एवं बेरोजगारी के दिनों में धन उपलब्ध कराता है| राज्य भी उनसे पशुवध के लिए पशु खरीदते हैं| जिसमें भैंसों की संख्या 6.2 करोड़ थी| नए नियम के अनुसार अब दोनों ही बाजार से कोई ऐसा क्रय विक्रय नहीं कर सकते है| चुनावी कारण सरकार का इसमें कोई निर्णय तर्क पर आधारित नहीं है| उनका उद्द्शेय केवल धार्मिक चिमनी को जलाए रखना है ताकि गाय का मसला चलता रहे| जनता के बीच चर्चा के लिए अन्य मुद्दे न आयें| जनता का भावुक शोषण हो और बहुमत को उत्तेजित कर वोट लिया जा सके| व्यापार, उपभोग, रोजगार, यह सब प्रतिकूल अवस्था में ही रहें और असली मुद्दे जनता की भावना पर हलके पड़ते रहें| इलेक्ट्रोनिक मीडिया भी इसी मुद्दे पर चिल्ला रहा है और इसे तवज्जो दे रहा है| चारों ओर अशांति है, स्वघोषित पहरेदार यह सब स्थिरभाव से देख रहा है| इन मुद्दों पर स्पष्ट स्थिति देने में उसकी सरकार का गला बैठ गया है इसीलिए| ये सरकार दूसरों के अभिव्यक्ति के अधिकार के मुख पर भी जाभी लगा रही है| 19 जून 2017 सोमवार द हिन्दू , कपिल सिब्बल(कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्र मंत्री एवं जाने मान अधिवक्ता ) के लेख का अनुवाद

राजद्रोही नारे

जटिल परिस्थितियों में हम अक्सर अपना संतुलन खो देते हैं| हमारे सामने जो भी स्थिति हो, हम उसे बिना सोचे-समझे पूर्वाग्रह से देखने लगते हैं| या यूँ कहूँ कि बौद्धिकता का त्याग कर किसी निर्णय पर पहुँच जाते हैं| जब बात भारत की हो, उसमें भी मुस्लिम की हो या पकिस्तान की हो, तब तो कोई और सोच आती ही नहीं|

मध्यप्रदेश और राजस्थान में पाकिस्तान की जीत का जश्न मनाए जाने के जुर्म में कुछ लोगों को हिरासत में लिया गया| बाद में मध्यप्रदेश के 15 आरोपियों को छोड़ दिया गया|

अपने देश की हार का जश्न मनाना दुखद या अनुचित है या हो सकता है, पर अपराध बिल्कुल नहीं और राजद्रोह तो किसी कीमत पर नहीं| जब ओवल, इंग्लैंड में भारतीय मूल के ब्रिटिश नागरिक वहां पर भारत की जीत का जश्न मनाते हैं, तो क्या वे हमारे लिए या ब्रिटेन के लिए राजद्रोही होते हैं? नहीं! हमारे लिए वे देशप्रेमी और राष्ट्रीय भावना से ओत-प्रोत नागरिक होते हैं| उनका संवैधानिक राष्ट्र उन्हें इस बात के लिए दण्डित नहीं करता और न ही तार्किक रूप से ऐसा कोई भी लोकतान्त्रिक-संवैधानिक राष्ट्र कर सकता है |

अब हम अपनी बात करते हैं| हमारे मन-मस्तिष्क में ऐसा कोई विचार कि वे राजद्रोही हैं, नहीं आता तो क्या हम ऐसे कृत्यों की आलोचना करने की नैतिकता रखते हैं? उचित बात तो यह होती कि हम ऐसे नारों पर कोई ध्यान ही ना देते क्योंकि उनका उद्देश्य केवल ध्यान आकर्षित करना होता है और उसमें हमारी पुलिस उनकी मदद ही कर देती है | जबकि हम अच्छे से जानते हैं कि उनकी इस गलती की सजा उन्हें नहीं दी जा सकती |

राजद्रोह

अब राजद्रोह की बात करते हैं| सर्वोच्च न्यायलय ने यह कई बार स्पष्ट किया है की राजद्रोह तभी हो सकता जब हिंसक उत्तेजना और भौतिक संरचना के ह्रास की स्थिति हो जो किसी के नारे लगाने से,पटाखे फोड़ने से  कभी प्रमाणित नहीं किया जा सकता हैं| मुद्दे की बात ये है कि जब कोई पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगाता है, तो बस हमारा माथा ठनक जाता है और बिना समझे भावना के अतिरेक में आ जाते हैं और आम जनता को भी आने देते हैं |भले ही सत्य से हम कितना ही दूर क्यूँ ना हो| खैर बात यह है की  1962 में केदारनाथ सिंह निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय ने राजद्रोह की स्थिति को स्पष्ट किया है |  उसके बाद 1995 में बलवंत सिंह का मुद्दा, जो ‘खालिस्तान जिंदाबाद’ के नारे लगाने का था, में भी यह बात स्पष्ट हुई और उसे राजद्रोह नहीं माना गया| पुनः सितम्बर 2016 में सर्वोच्च न्यायलय ने इसे परिभाषित भी किया|

अब सवाल यह उठता है कि इन सब के बावजूद हमारी पुलिस या चुनी हुई सरकार ऐसा क्यों करती है? यह बहुत दुखद है कि हमारे किसी भी राजनेता में इसे अनुचित कहने की हिम्मत नहीं |

लन्दन के एक भाषण में पिछले वर्ष अरुण जेटली जी ने कहा था “अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता किसी भी तरह आपको राष्ट्र की संप्रभुता पर हमला करने की अनुमति नहीं देता|” संविधान के अनुच्छेद 19(1) के तहत हमें मौखिक रूप से तीखी आलोचना या अभिव्यक्ति करने की आज़ादी है| हाँ! अगर वह भौतिक हिंसा या कहें शारीरिक हमला करते हैं तो वह गलत होगा, जिसके लिए अनुच्छेद 19(2) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर युक्ति युक्त बंधन लगाता है| यहाँ समझने वाली बात यह है की यह सब केवल प्रावधान मात्र हैं, कोई कानून नहीं| अतः राजद्रोह कानून को पढने से लगता हैं कि इसकी पेचीदगियों को समझा जाना आज के समय में शासन और जनता दोनों के लिए जरुरी हैं|

प्रेम

आप जब अकेले होते हैं तो आपके साथ यादें होती हैं |वो यादें जो भाषा के स्वरूप में आपमें समाहित हैं | वही रूप बदलकर कविता हो जाती है | कल्पना का पुट , भंगिमा की छूट ,आपका अपना संसार भावनाओं का अम्बार , सब मिलकर आपको अब तक बिताये वसंत , पतझड़ ,सूखा ,बारिश ,ठण्ड सब याद दिलाते हैं | ऐसे में शब्द की साधना आपके अकेलेपन को दूर करती है और प्रकृति में समाहित स्वयं की सारी छवि आपके समक्ष आ जाती है और बन जाती है कविता | भाषा का आविष्कार पूर्ण रूप से मानव का अपना है | उसका निर्माण प्रकृति ने किया पर प्रयोग की अधिकतम सम्भावना को संभव बनाया हम मनुष्यों ने हमारी कविताओं ने उसे नया आयाम दिया | हमारे चिंतन ने उसे नया नाम दिया|  ऐसे ही चिंतन के क्षणों में उपजित कविता है‘ प्रेम’ – प्रेम जो  हम सबका साझा खजाना है पर इसे हम न समझ पाए है, न समझने का प्रयास करते हैं बस सत्ता के बहकावे में आकर बंटते है बांटते हैं , कटते हैं काटते हैं| पर कवि इसे समझता है या कहें समझना चाहता है | जब सब की यह साझी सम्पति है साझी विरासत है साझी सम्भावना है साझी कल्पना है और साझा सच है तब इसका इतना बंटवारा क्यों ?

हे शक्ति मन्त्र

संबंधों को बांधने का अटूट यंत्र

तुम कैसे जीते हो

आकर्षण हो या हो तृष्णा

किस धागे और सुई से संबंधों को सीते हो |

तुम्हारे पहचान का मिलना

तुम्हारे धारणा का हृदय में खिलना

जीवन में आनंद की धारा

श्रध्दा ,करूणा , और वेदना की परंपरा

किस दर्शन की श्रृंखला हो तुम ?

विज्ञान का कौन सा सिद्धहांत

ईश्वर का वरदान हो हमको

या हमारे जीवन का विराम |

दया और अनुकम्पा का आरम्भ हो

या अदृश्य पवित्रता की गंगा

प्राणियों का मनुष्यत्व हो

या संहार  की सृजन कर्ता

संगीत की सुरलहरी हो

या प्रलय की रौद्र  सागर

जीवन की आकुलता हो

या जीवन पार की असीम शांति

अश्रु कणों का सागर हो तुम

भावों की उज्जवल नदियाँ

जाति ,धर्म का पर्वत क्यों है ?

यहाँ आये तुम्हे जब हुई सदियाँ |

हीरे सी निष्ठुर हो तुम

कांच को भी काट देती हो

जिस पल में रिश्ता हो जोड़ती

उसी पल रिश्ता एक तोड़ देती हो

मैं,मेरा,मुझे, या हमें हमारा

स्व ,समूह , देश या संसार सारा

सब तुम पर ही आसीन है

फिर भी तू क्यों पराधीन  है

उत्सव बना रहा है कोई

तुझे खुद में समाकर

उसे ही जला रहा है कोई

तेरे आवेश में आकर

तुझसे निर्मित तेरे ये रूप

धर्म,जाति , गोत्र ,देश, समाज

हो गये हैं क्यों इतने कुरूप

मानव हृदय में आने का

क्या तेरा यही काम था

इस सुन्दर विश्व को

क्या बनाना श्मशान था ?

संस्कार ,संस्कृति ,का उत्कर्ष जब तू है

विचार ,व्यवहार का निष्कर्ष जब तू है

तो मानव तुझे पाकर भी क्यों तुझे ही खोता है

ये तेरी है समस्या या मानव ही निकृष्ट ,खोटा है

तुझे खुद में समाकर खूब खुश होता है

तेरे लिए ही तुझे खोकर खूब रोता है

तुझे पाकर हम मानव निराकार होते हैं

पर तुझे हमेशा साकार कर ढोते हैं

मूर्त ,मंदिर ,मस्जिद, गिरिजा

सब में तुझको बाँट लिया

आधा आधा सबने समझा

हमने खुद को काट लिया |                                                        15|10|2013   

                                                                                                 गोपाल